Thursday, June 20, 2013
Random Clicks #02
प्रकृति ने पेड़-पौधों के रूप में हमें एक अनमोल तोहफा दिया है.. 'रेण्डम क्लिक्स' की दूसरी कड़ी में कुछ पेड़ पौधों की तस्वीरें 'रेण्डम' जगहों से..
Sunday, May 5, 2013
पुरी यात्रा #03 (चिलिका झील)
पुरी में ये हमारा तीसरा दिन था और आज सतपाड़ा जानें की बारी थी.. मौसम अभी साफ था, और सुनहरी धूप खिली हुई थी.. सुबह करीब आठ बजे ही हम सतपाड़ा के लिए निकल चुके थे..
पुरी से सतपाड़ा का रास्ता आदिवासी गावों से होकर जाता है; रास्ते भर एक ओर चावल के खेत हैं तो दूसरी ओर छोटे छोटे तालाब, नारीयल और काजू के पेड़.. लगभग एक घंटे में हम सतपाड़ा में थे; यहां 'चिलिका झील' का पूर्वी किनारा है जो पर्यटकों में काफी प्रसिद्ध है.. यहां से मोटरबोट किराए पर लेकर झील में स्थित आइलैंड्स की सैर को निकला जा सकता है..
ये झील दया नदी के मुहानें पर स्थित है, जहां ये बंगाल की खाड़ी में गिरती है.. चिलिका भारत की सबसे बड़ी और विश्व में दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की झील है.. इसमें कई आइलैंड्स हैं जिसमें सबसे बड़ा 'राजहंस आइलैंड' है जो झील और समुद्र के बीच करीब 60 km लम्बा अवरोध बनाता है..
झील के पूर्वी किनारे से हम एक मोटरबोट में बैठकर राजहंस के लिए निकल पड़े.. हमारे नाविक श्री अशोक कुमार नें हमें लगभग एक घंटे की बोटिंग और कुछ डोलफिन्स के दर्शन के बाद राजहंस आइलैंड पहुंचाया..
यहां पर्यटकों के सुस्तानें के लिए कुछ रेस्टोरंट्स भी हैं जो आपके बोट से उतरते ही आपको बुलानें लगते हैं और फिर आपसे यहां के 'सी-फूड्स' को चखनें का आग्रह करनें लगते हैं.. सी-फूड्स खानें का ये एक अच्छा मौका हो सकता है पर स्वास्थ्य का ख्याल रखते हुए यहां ना ही खाया जाए तो बेहतर है.. खैर हम तो ठहरे शाकाहारी; सो, हमारे लिए यहां बस चाय ही उपलब्ध थी..
यहां चिलिका के तट पर 'लाल केकड़े' बहुतायत में पाए जाते हैं, जो आपके नजदीक जाते ही रेत के बनें अपनें अपनें बिलों में घुस जाते हैं..
राजहंस आइलैंड के एक ओर चिलिका का शानदार झील है तो दूसरी ओर समुद्र.. यहां का समुद्रतट बेहतरीन है; पर चूंकि यहां आप बोट से आए हैं और आपके पास अतिरिक्त कपड़े उपलब्ध नहीं होते, बस इसलिए आप अपनें आप को यहां नहानें से रोक लेते हैं..
यहां से वापसी में इस आइलैंड पर ही बनें कुछ मंदिर हैं जिन्हें देखा जा सकता है.. खैर, हमनें काफी समय यहां के खूबसूरत समुद्रतट को देखनें में बिता दिए थे, और अबतक मौसम भी करवट ले चुका था और हवाएं भी थोड़े जोरों से चलने लगी थी; हम जल्दी से वापस पहुंच जाना चाहते थे पर शायद चिलिका का मौसम ये नहीं चाहता था..
वापसी में तेज हवाओं के साथ जोरदार बारिश हुई, हमारी बोट जोरों से हिचकोलें खानें लगी थी; लहरें जोरों से हमारे बोट से टकरा रही थी.. हम झील के बीचों-बीच थे और हमारे मोटरबोट का इंजन बंद हो गया था.. हमारी हालत खराब ही होनें वाली थी पर तभी हमारे नाविक नें हमारे बोट से छलांग लगा दी थी और झील के बीचों बीच हमारे बोट के सामने खड़ा था, हम आश्चर्यचकित थे; हमें बिलकुल भी झील की गहराई का अंदाजा नहीं था.. ये झील ज्यादा गहरा नहीं हैं, इसकी औसत गहराई करीब चार-पांच फीट ही है, और जहां हम थे वहां तो मुस्किल से ये दो फीट गहरा रहा होगा.. बहरहाल; झील में एक बांस गाड़ दिया गया, और हमारी बोट को उससे एक रस्सी के सहारे बांध दिया गया; धीरे-धीरे लहरें शांत हुईं और फिर हम आगे बढ़ सके.. किनारे आते-आते काफी देर हो चुकी थी..
यहां से वापसी में हमें जगन्नाथ मंदिर भी जाना था; कलिंग शैली से बना ये मंदिर बहुत सुन्दर है.. मंदिर को जाती सड़क चौड़ी है और यहां काफी भीड़-भाड़ भी रहती है, ये पुरी का मुख्य केंद्र है.. मंदिर के अंदर आपको कैमरा, मोबाईल, इत्यादी ले जानें की इजाजत नहीं है.. मंदिर परिसर में ही आगे 'आनंद बाजार' है, जो दुनिया की सबसे बड़ी 'फूड मार्केट' है; खाने के शौकीन लोगों के लिए आनंद बाजार एकदम सही जगह है..
आज देर शाम हमें ट्रेन पकड़नी थी, सो हम जल्दी यहां से वापस होटल पहुंच चुके थे, पुरी रेलवे स्टेशन हमारे होटल से करीब पंद्रह मिनट की दूरी पर था.. देर शाम करीब साढ़े आठ बजे हम फिर ट्रेन में बैठे थे वापस रांची जानें के लिए.. रातभर की यात्रा के बाद दिन में करीब बारह बजे हम रांची पहुंचे..
पुरी से सतपाड़ा का रास्ता आदिवासी गावों से होकर जाता है; रास्ते भर एक ओर चावल के खेत हैं तो दूसरी ओर छोटे छोटे तालाब, नारीयल और काजू के पेड़.. लगभग एक घंटे में हम सतपाड़ा में थे; यहां 'चिलिका झील' का पूर्वी किनारा है जो पर्यटकों में काफी प्रसिद्ध है.. यहां से मोटरबोट किराए पर लेकर झील में स्थित आइलैंड्स की सैर को निकला जा सकता है..
ये झील दया नदी के मुहानें पर स्थित है, जहां ये बंगाल की खाड़ी में गिरती है.. चिलिका भारत की सबसे बड़ी और विश्व में दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की झील है.. इसमें कई आइलैंड्स हैं जिसमें सबसे बड़ा 'राजहंस आइलैंड' है जो झील और समुद्र के बीच करीब 60 km लम्बा अवरोध बनाता है..
झील के पूर्वी किनारे से हम एक मोटरबोट में बैठकर राजहंस के लिए निकल पड़े.. हमारे नाविक श्री अशोक कुमार नें हमें लगभग एक घंटे की बोटिंग और कुछ डोलफिन्स के दर्शन के बाद राजहंस आइलैंड पहुंचाया..
यहां पर्यटकों के सुस्तानें के लिए कुछ रेस्टोरंट्स भी हैं जो आपके बोट से उतरते ही आपको बुलानें लगते हैं और फिर आपसे यहां के 'सी-फूड्स' को चखनें का आग्रह करनें लगते हैं.. सी-फूड्स खानें का ये एक अच्छा मौका हो सकता है पर स्वास्थ्य का ख्याल रखते हुए यहां ना ही खाया जाए तो बेहतर है.. खैर हम तो ठहरे शाकाहारी; सो, हमारे लिए यहां बस चाय ही उपलब्ध थी..
यहां चिलिका के तट पर 'लाल केकड़े' बहुतायत में पाए जाते हैं, जो आपके नजदीक जाते ही रेत के बनें अपनें अपनें बिलों में घुस जाते हैं..
राजहंस आइलैंड के एक ओर चिलिका का शानदार झील है तो दूसरी ओर समुद्र.. यहां का समुद्रतट बेहतरीन है; पर चूंकि यहां आप बोट से आए हैं और आपके पास अतिरिक्त कपड़े उपलब्ध नहीं होते, बस इसलिए आप अपनें आप को यहां नहानें से रोक लेते हैं..
यहां से वापसी में इस आइलैंड पर ही बनें कुछ मंदिर हैं जिन्हें देखा जा सकता है.. खैर, हमनें काफी समय यहां के खूबसूरत समुद्रतट को देखनें में बिता दिए थे, और अबतक मौसम भी करवट ले चुका था और हवाएं भी थोड़े जोरों से चलने लगी थी; हम जल्दी से वापस पहुंच जाना चाहते थे पर शायद चिलिका का मौसम ये नहीं चाहता था..
वापसी में तेज हवाओं के साथ जोरदार बारिश हुई, हमारी बोट जोरों से हिचकोलें खानें लगी थी; लहरें जोरों से हमारे बोट से टकरा रही थी.. हम झील के बीचों-बीच थे और हमारे मोटरबोट का इंजन बंद हो गया था.. हमारी हालत खराब ही होनें वाली थी पर तभी हमारे नाविक नें हमारे बोट से छलांग लगा दी थी और झील के बीचों बीच हमारे बोट के सामने खड़ा था, हम आश्चर्यचकित थे; हमें बिलकुल भी झील की गहराई का अंदाजा नहीं था.. ये झील ज्यादा गहरा नहीं हैं, इसकी औसत गहराई करीब चार-पांच फीट ही है, और जहां हम थे वहां तो मुस्किल से ये दो फीट गहरा रहा होगा.. बहरहाल; झील में एक बांस गाड़ दिया गया, और हमारी बोट को उससे एक रस्सी के सहारे बांध दिया गया; धीरे-धीरे लहरें शांत हुईं और फिर हम आगे बढ़ सके.. किनारे आते-आते काफी देर हो चुकी थी..
यहां से वापसी में हमें जगन्नाथ मंदिर भी जाना था; कलिंग शैली से बना ये मंदिर बहुत सुन्दर है.. मंदिर को जाती सड़क चौड़ी है और यहां काफी भीड़-भाड़ भी रहती है, ये पुरी का मुख्य केंद्र है.. मंदिर के अंदर आपको कैमरा, मोबाईल, इत्यादी ले जानें की इजाजत नहीं है.. मंदिर परिसर में ही आगे 'आनंद बाजार' है, जो दुनिया की सबसे बड़ी 'फूड मार्केट' है; खाने के शौकीन लोगों के लिए आनंद बाजार एकदम सही जगह है..
आज देर शाम हमें ट्रेन पकड़नी थी, सो हम जल्दी यहां से वापस होटल पहुंच चुके थे, पुरी रेलवे स्टेशन हमारे होटल से करीब पंद्रह मिनट की दूरी पर था.. देर शाम करीब साढ़े आठ बजे हम फिर ट्रेन में बैठे थे वापस रांची जानें के लिए.. रातभर की यात्रा के बाद दिन में करीब बारह बजे हम रांची पहुंचे..
Sunday, April 28, 2013
पुरी यात्रा #02 (सुर्य मंदिर, कोणार्क)
दूसरे दिन मेरी इच्छा समुद्रतट पर सुर्योदय को अपनें कैमरे में कैद करनें की थी, पर मौसम नें हमारी इच्छा पर पानी फेर दिया.. हल्की बरसात हो रही थी और आसमान बादलों से पूरी तरह ढ़का था, ऐसे में सुर्यदेव के दर्शन असंभव थे.. होटल के कमरे में बैठे-बैठे हम आज का प्रोगाम तय कर रहे थे, इतने में एक 'टूर एण्ड ट्रेवल' वाले नें हमारे दरवाजे पर दस्तक दी, हमनें उसके द्वारा उपलब्ध करायी जा रही सारी सुविधाओं पर विचार किया और फिर कोणार्क और दूसरे दिन सतपाड़ा के लिए हमारी बात तय हो गयी, और फिर करीब आधे घंटे में हमारी कार भी होटल के दरवाजे पर खड़ी थी; आज कोणार्क जानें का कार्यक्रम था..
करीब चालीस मिनट की ड्राईव के बाद हम कोणार्क में थे, बारिश अब लगभग थम चुकी थी; रातभर की बरसात के बाद कोणार्क का मंदिर नहा-धोकर हमारी प्रतिक्षा कर रहा था..
मंदिर परिसर में घुसते ही मैनें अपना कैमरा 'ऑन' कर लिया था, फिर लगभग दो-तीन घंटे लगे हमें पूरा मंदिर देखनें में और इस दौरान मुझे अपनें कैमरे को 'ऑन' ही रखना पड़ा.. कोणार्क का सुर्यमंदिर अपनी विशालता, मूर्तिकला तथा वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, ये मंदिर अब काफी जर्जर हो चला है पर पत्थरों पर की गयी ऐसी महीन नक्काशी देखनें लायक है..
मंदिर के कई उंची जगहों पर चढ़नें, तथा कई कलाकृतियों को छूनें तक की इजाजत नहीं है.. इस मंदिर की कल्पना सुर्यदेव के रथ के रुप में की गयी है, जिसमें चौबीस पहिए लगे हैं और जिसे सात घोड़े खींच रहे हैं..
कई नक्काशियां, खासकर, पत्थरों से बने हाथियों को मारते दो बड़े सिंह आपको मंदिर निर्माण के उस काल में ले जाकर आश्चर्य और भावुकता से भर देते हैं..
सुर्यमंदिर के पीछे छायादेवी का मंदिर है और उसके पीछे ईंट का मंदिर..
चार-पांच चक्कर लगाये बिना आप इस पूरे मंदिर को अच्छी तरह से नहीं देख सकते..
मंदिर परिसर में 'भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग' द्वारा बनाया गया पार्क भी सराहनीय है..
मंदिर के चारों ओर एक 'पाथवे' बनाया गया है जो कुछ खास तो नहीं है पर अगर आप इस भव्य मंदिर को अलग अलग कोणों से देखनें के इच्छुक हैं या फिर फोटोग्राफी का शौक रखते है, तो ये 'पाथवे' काफी उपयोगी सिद्ध हो सकता है..
मंदिर से मुख्य मार्ग तक की सड़क दोनों ओर दुकानों से भरी है, यहां ओडिसा के खास स्क्रिपचर्स, मंदिरों की प्रतिकृति और हैंडीक्राफट्स की दुकानें हैं, पुरी या कोणार्क से जुड़ी वस्तुएं लेनें के ये अच्छे स्त्रोत साबित हो सकते हैं..
यहां से 'चंद्रभागा बीच' थोड़ी ही दूरी पर है, जहां पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता है, कोणार्क से पुरी का रास्ता काफी रमणीक है, लगभग पूरे रास्ते एक ओर जहां समुद्र है तो दूसरी और 'बालूखण्ड वाइल्डलाईफ सेंक्चुरी', बहुतायत में काजू के पेड़ भी आपको इस रास्ते के किनारे देखनें को मिलेंगे.. पुरी से कोणार्क तक का रास्ता 'पुरी कोणार्क मरीन ड्राइव' के नाम से जाना जाता है.. इस रास्ते में कई मंदिर भी हैं जिसके पुजारियों द्वारा रास्ते में बार बार आपकी कार को रोक दिया जाता है, और मंदिर के नाम पर बीस-पचास रुपए लेनें के बाद ही छोड़ा जाता है..
देर शाम हमारा स्वर्गद्वार जाना हुआ, यहां का समुद्रतट काफी लोकप्रिय है, जिसे 'गोल्डन बीच' कहा जाता है.. बीच पर कुछ देर टहलनें के पश्चात् हम किनारे सुस्ताने लगे, रात होते होते यह तट एक छोटे मार्केट का रुप ले लेता है जो देर रात तक गुलजार रहता है; यहां पुरी से जुड़ी वस्तुएं काफी सस्ते में खरीदी जा सकती हैं..
अब पुरी यात्रा की तीसरी कड़ी में हम सतपाड़ा जानें वाले हैं जहां का 'चिलका लेक' विश्व प्रसिद्ध है.. पुरी यात्रा की ये श्रृंखला आपको कैसी लग रही है? ये आप हमें कमेंट कर बता सकते हैं या आप हमें drishti@suhano.in पर इ-मेल भी कर सकते हैं..
करीब चालीस मिनट की ड्राईव के बाद हम कोणार्क में थे, बारिश अब लगभग थम चुकी थी; रातभर की बरसात के बाद कोणार्क का मंदिर नहा-धोकर हमारी प्रतिक्षा कर रहा था..
मंदिर परिसर में घुसते ही मैनें अपना कैमरा 'ऑन' कर लिया था, फिर लगभग दो-तीन घंटे लगे हमें पूरा मंदिर देखनें में और इस दौरान मुझे अपनें कैमरे को 'ऑन' ही रखना पड़ा.. कोणार्क का सुर्यमंदिर अपनी विशालता, मूर्तिकला तथा वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, ये मंदिर अब काफी जर्जर हो चला है पर पत्थरों पर की गयी ऐसी महीन नक्काशी देखनें लायक है..
मंदिर के कई उंची जगहों पर चढ़नें, तथा कई कलाकृतियों को छूनें तक की इजाजत नहीं है.. इस मंदिर की कल्पना सुर्यदेव के रथ के रुप में की गयी है, जिसमें चौबीस पहिए लगे हैं और जिसे सात घोड़े खींच रहे हैं..
कई नक्काशियां, खासकर, पत्थरों से बने हाथियों को मारते दो बड़े सिंह आपको मंदिर निर्माण के उस काल में ले जाकर आश्चर्य और भावुकता से भर देते हैं..
सुर्यमंदिर के पीछे छायादेवी का मंदिर है और उसके पीछे ईंट का मंदिर..
चार-पांच चक्कर लगाये बिना आप इस पूरे मंदिर को अच्छी तरह से नहीं देख सकते..
मंदिर परिसर में 'भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग' द्वारा बनाया गया पार्क भी सराहनीय है..
मंदिर के चारों ओर एक 'पाथवे' बनाया गया है जो कुछ खास तो नहीं है पर अगर आप इस भव्य मंदिर को अलग अलग कोणों से देखनें के इच्छुक हैं या फिर फोटोग्राफी का शौक रखते है, तो ये 'पाथवे' काफी उपयोगी सिद्ध हो सकता है..
मंदिर से मुख्य मार्ग तक की सड़क दोनों ओर दुकानों से भरी है, यहां ओडिसा के खास स्क्रिपचर्स, मंदिरों की प्रतिकृति और हैंडीक्राफट्स की दुकानें हैं, पुरी या कोणार्क से जुड़ी वस्तुएं लेनें के ये अच्छे स्त्रोत साबित हो सकते हैं..
यहां से 'चंद्रभागा बीच' थोड़ी ही दूरी पर है, जहां पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता है, कोणार्क से पुरी का रास्ता काफी रमणीक है, लगभग पूरे रास्ते एक ओर जहां समुद्र है तो दूसरी और 'बालूखण्ड वाइल्डलाईफ सेंक्चुरी', बहुतायत में काजू के पेड़ भी आपको इस रास्ते के किनारे देखनें को मिलेंगे.. पुरी से कोणार्क तक का रास्ता 'पुरी कोणार्क मरीन ड्राइव' के नाम से जाना जाता है.. इस रास्ते में कई मंदिर भी हैं जिसके पुजारियों द्वारा रास्ते में बार बार आपकी कार को रोक दिया जाता है, और मंदिर के नाम पर बीस-पचास रुपए लेनें के बाद ही छोड़ा जाता है..
देर शाम हमारा स्वर्गद्वार जाना हुआ, यहां का समुद्रतट काफी लोकप्रिय है, जिसे 'गोल्डन बीच' कहा जाता है.. बीच पर कुछ देर टहलनें के पश्चात् हम किनारे सुस्ताने लगे, रात होते होते यह तट एक छोटे मार्केट का रुप ले लेता है जो देर रात तक गुलजार रहता है; यहां पुरी से जुड़ी वस्तुएं काफी सस्ते में खरीदी जा सकती हैं..
अब पुरी यात्रा की तीसरी कड़ी में हम सतपाड़ा जानें वाले हैं जहां का 'चिलका लेक' विश्व प्रसिद्ध है.. पुरी यात्रा की ये श्रृंखला आपको कैसी लग रही है? ये आप हमें कमेंट कर बता सकते हैं या आप हमें drishti@suhano.in पर इ-मेल भी कर सकते हैं..
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