Saturday, September 29, 2012

बीज

   मनुष्य दुख के बीज बोता रहता है और रोता है कि वह दुखी क्यों है..? मनुष्य की मूर्छा गहरी है, मूर्छा के ही कारण से हमें यह दिखाई नहीं पड़ता कि जो बीज हम बो रहे हैं वे दुख के हैं अथवा आनन्द के.. हम बीज तो दुख के बोते हैं पर फसल आनन्द की काटना चाहते हैं, जो कि असंभव ही है.. अगर हम आनन्द की फसल काटना चाहते हैं तो निश्चित ही हमें आनन्द के बीज ही बोने पड़ेंगे...
   'ध्यान' आनन्द का बीज है... कुछ समय से मैं ये बीज बो रहा हूँ... और अब फसल भी आने लगी है...

Friday, September 14, 2012

गरिमा

   मैं इस आस्तित्व में सांयोगिक नहीं हूँ। आस्तित्व को मेरी जरुरत है। मैं नहीं हूंगा तो कुछ अधूरा रह जायेगा। यह तथ्य मुझे गरिमा देता है, पूरा आस्तित्व मेरा घर है।
   छोटे छोटे घरों में बंधना नहीं है। शरीर को रहनें के लिए एक मकान काफी होता है, मन के लिए दस भी कम मालूम होते हैं।