Saturday, April 27, 2013

पुरी यात्रा #01

      यूँ तो पुरी जानें के लिए ये अनूकूल मौसम नहीं कहा जा सकता, परन्तु अप्रैल की अठ्ठारह को शाम चार बजे हम हटिया से पुरी जानें वाली 'तपस्विनी एक्सप्रेस'  में बैठे थे.. हमारा तीन दिनों का कार्यक्रम पुरी भ्रमण का था.. मैं 'कोणार्क के सुर्य मंदिर' को देखनें को उत्साहित था, साथ ही 'समुद्रतट' और 'चिलका झील' देखनें को रोमांचित भी था..
      तय समय पर ट्रेन रवाना हुई.. हम शुभचिंतको की शुभकामनाओं को अपनें-अपनें मोबाइल में समेटते हुए आगे बढ़ रहे थे, नए-नए स्टेशनों को देखते हुए और आपसी बातचीत में समय भी ट्रेन के साथ-साथ द्रुत गति से भाग रहा था.. यूं तो ट्रेन पर खानें-पीनें की चीजें लेनें से हम अक्सर परहेज करते हैं पर 'बानो स्टेशन' में ताजे पपीते देख कर हम खुद को रोक नहीं सके, और सचमुच पपीते काफी स्वादिष्ट थे.. रात में घर से तैयार 'डिनर' हमारा इंतजार कर रहा था, जिसके बाद हम सब अपनें-अपनें बर्थ पर पसरनें की तैयारी करनें लगे.. अब तक रात के दस बजनें वाले थे और हम ओड़िसा में प्रवेश कर चुके थे..रात भर की यात्रा के बाद सुबह करीब आठ बजे यानी कि लगभग एक घंटे लेट हम पुरी स्टेशन पर थे.. पुरी का मौसम अपेक्षा के अनूरुप गर्म था पर आसमान के हल्के हल्के बादल हमें दिलाशा भी दे रहे थे..
      ट्रेन से उतरते ही ओटोरिक्शा वालों नें हमारा पीछा करना शुरु कर दिया था, पुरी आए हुए अनुभवी लोगों से हमें पहले ही हिदायतें मिल चुकी थी; सो हम सतर्क थे, पर हमारी सतर्कता तब धरी की धरी रह गयी जब 'ओटोवाले' ने हमें स्वर्गद्वार की जगह चक्र-तीरथ रोड़ पर छोड़ दिया (ये हमें बाद में पता चला).. खैर, यहां का समुद्रतट स्वर्गद्वार जितना सुन्दर तो नहीं है पर उससे कम भी नहीं है, इसे 'फोरेन बीच' कहा जाता है,





      और यहां बिलकुल समुद्रतटके किनारे ही हमें बड़े सस्ते में होटल में कमरा भी मिल गया; और कमरा भी शानदार था.. थोड़ी देर सुस्तानें के बाद हम बीच पर थे.. पहली बार का समुद्र दर्शन रोमांचक था, पर इस वक्त तेज धूप थी और ज्यादा देर रुकना संभव नहीं था; सो हम किनारे नारीयल के पत्तों से बने एक मचान की छांव में बैठ कर नारीयलपानी पीनें लगे.. नारीयल यहां बहुतायत में पाया जाता है पर इसका मूल्य 'रांची' के बराबर ही था.. वहां से हम एक अच्छे 'रेस्टोरंट' की खोज में निकल पड़े, यहां के रेस्टोरंट्स हमारी फरमाइशें पूरी नहीं कर पा रहे थे क्यूंकि हमारी कुछ विशिष्ट फरमाइशें थीं जैसे: हमें शाकाहारी भोजन चाहिए था, पापा तेल से बनी वस्तुएं नहीं लेते, तो उन्हें घी से बनीं सब्जियां चाहिए थीं और साथ में सलाद हमें अनिवार्य रुप से चाहिए था.. काफी खोजबीन के बाद हमें एक भोजनालय मिला जो हमारी फरमाइशें पूरी कर सकता था.. वापस होटल आनें के बाद, फिर; शाम को मुसलाधार बरसात नें हमें कहीं जानें नहीं दिया..

      कैसा रहा पुरी में हमारा दूसरा दिन, ये जाननें के लिए आपको थोड़ा सा इंतजार करना होगा, और अभी तक ठीक से फोटोग्राफी भी तो शुरु नहीं हुई है.. इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हम चलेंगे कोणार्क के सुर्यमंदिर की सैर को..


7 comments:

  1. युँ तो पहला भाग पढ के मजा आ गया.....दुसरे भाग का बेसब्री से इंतजार है....हम भी कोणार्क मन्दिर देखने को बेताब हो रहे है...जल्दी करिये......!!

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया अखिलेन्द्रजी.. दूसरा भाग भी लगभग तैयार ही है, बहुत जल्द आपके सामनें लाएंगे...

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  2. पहला भाग तो बहुत ही मजेदार है जी

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  3. मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

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  4. ........ पढ के मजा आ गया.

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